मंगलवार, 10 मार्च 2009

काल-गणना के बारे में भारतीय धारणाएं खंगालना जरूरी

भारतीय काल-गणना
वैज्ञानिकों को भारतीय धारणाएं खंगालना जरूरी
उड़नतश्तरियों (यूएफओ- अनआइडेंटीफाई फाॅरेन आॅब्जेक्ट्स) के बारे में अर्से से सुना जाता रहा है. कुछ ऐसे लोग भी मिले हैं जिनका दावा था कि उन्होंने उड़नतश्तरियों को देखा है. इस बाबद अमेरिका ने विस्तृत जानकारियां एकत्रित की हुई हंै. हाल ही में उसके वैज्ञानिकों ने ऐसा दावा किया था कि ये यूएफओ हमारी हर गतिविधियों पर पैनी निगाह रखे हैं, उन्हें हमारी पल-पल की जानकारी भी रहती है. ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि कहां से आती हैं ये उड़नतश्तरियां और कौन होता है इनमें. ऐसे बहुत से सवाल हैं, जिनका आज तक न तो वैज्ञानिकों और न ही आम आदमी को उत्तर नहीं मिल पाया है.
उड़नतश्तरियों के बारे में जानने से पहले यह जरूरी है कि उन कारणों का जिक्र किया जाए, जिनके कारण उड़नतश्तरियां अस्तित्व में आती हैं. वैज्ञानिकों का काम शोध करना होता है, इसके लिए वे हर जायज-नाजायज काम को अंजाम देने से परहेज नहीं करते हैं. ऐसे में यदि ब्रह्मांड की उत्पति का पता लगाना वैज्ञानिकों का ध्येय हो तो भला उन्हें कौन रोक सकता है. इसी ब्रह्मांड की उत्पति का रहस्य जानने के लिए लार्ज हेड्राॅन कोलाइडर मशीन का सहारा लिया जा रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ब्रह्मांड की उत्पति एक महाविस्फोट (बिग बैंग) के कारण हुई थी. यह महाविस्फोट क्यों हुआ था, इसका कारण अभी तक वैज्ञानिक नहीं खोज पाए हैं. चूंकि विज्ञान का सारा दारोमदार प्रयोगों के परिणामों पर आश्रित होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि किसी आरोपी को सजा दिलाने के लिए कानून में सबूतों का होना जरूरी होता है. अब यदि वैज्ञानिक अपनी शोध ही पूरी नहीं कर पाएं तो उसका परिणाम तो अबूझ ही रहेगा.
ऐसा कहा जाता है और वैज्ञानिकों ने इसे माना भी है कि इस सृष्टि में अनेक सौर मंडल (सूर्य) मौजूद हैं. इसी तरह यह भी एक तथ्य है कि जब सृष्टि में अनेक सूर्य मौजूद हैं तो इसे तय मानना ही होगा कि इन सूर्याें की अपनी धरती भी होगी ही, क्योंकि प्रकृति की प्रकृति के अनुसार ऐसा होना न सिर्फ जरूरी है, बल्कि शाश्वत भी यही है कि प्रत्येक सूर्य की या हर सौर मंडल की पृथ्वी होना आवश्यक है, लेकिन हमारे मौजूदा वैज्ञानिक अभी तक सिर्फ और सिर्फ कुछ सौर मंडल और सूर्य को ही खोज पाए हैं, किसी भी सूर्य या सौर मंडल की पृथ्वी को खोज पाना अभी तक उनके लिए संभवतः इसलिए संभव नहीं हो पाया है, क्योंकि सौर मंडल या फिर सूर्य धरती के मुकाबले काफी बड़े होते हैं, इसलिए इन्हें ढू़ंढ पाना अपेक्षाकृत अधिक आसान माना जा सकता है, या फिर यह हो सकता है कि दूसरे सौर मंडलों में भी ब्लेक-होल वैज्ञानिकों को दिखाई दिए हों.
इस समय पाश्चात्य देशों द्वारा बनाई गई रणनीतियों से पूरी दुनिया में उनकी सोच का ही बोलबाला है. उनकी हर जायज अथवा नाजायज दलील को मान लेने में ही शेष दुनिया अपनी भलाई समझती है, क्योंकि कोई भी 'पानी में रहकर मगर से बैर रखने' को कम से कम आज के समय में समझदारी नहीं समझता है. इस बात के एक नहीं अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो इस बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त होंगे कि किस तरह से पूरी दुनिया पर उस पाश्चात्य सोच की धूम मची है, जिसे पश्चिमी लोग वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित बताते नहीं अघाते हैं. और चाहते हैं कि उनके द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था के अनुसार ही बाकी दुनिया के लोग भी बिना कोई सवाल-जवाब किए इसे अपनाएं और सदियों से चली आ रही अपनी मान्यताओं-परंपराओं को हमेशा के लिए तिलांजली दे दें, और ऐसा करते हुए यह भी भूल जाएं कि विज्ञान का इतिहास अधिकतम पांच सौ साल पुराना ही है, जबकि मनुष्य (आदम) की उत्पति कम से कम करोड़ों नहीं तो लाखों वर्ष पुरानी तो अवश्य है ही.
इसके लिए यदि भारतीय हिंदू धर्मग्रंथों का अवलोकन और अध्ययन किया जाए तो एक सबसे जरूरी बात पहले ही साफ हो जाती है कि हमारी मौजूदा धरती से पहले भी अनेक धरतियां हुई हैं और यह मौजूदा धरती उनके बाद की धरती है. इसका उल्लेख प्रत्येक हिंदू द्वारा संपन्न किए जाने वाले अपने हर धार्मिक अनुष्ठान के सबसे पहले लिए जाने वाले हर संकल्प में इस तरह होता है- 'सप्तमे वैवस्वत मन्वंतरे' अर्थात् इससे पहले छह मन्वंतर हो चुके हैं और प्रत्येक मन्वंतर में अनेक धरतियां होती हैं, प्रत्येक मन्वंतर में अपने भिन्न 'मनु' होते हैं. जिस तरह सप्तम (सातवें) मन्वंतर के मनु वैवस्वत हैं, इसी तरह आठवें मन्वंतर का नाम सावर्णि है. 'मनु' से तात्पर्य 'मनुष्य' की उत्पति से है, ठीक वैसे ही जैसे 'आदम' से 'आदमी' की उत्पति मानी जाती है.
इसी तरह भारतीय हिंदू धर्मग्रंथों में काल (समय) का उल्लेख किया गया है. इसे जानने से पहले यह बताना जरूरी है कि काल का मतलब समय तो होता ही है, काल का मतलब मृत्यु भी है. काल (समय) के बारे में विस्तार से बताते हुए धर्मग्रंथ में लिखा गया है कि काल वह परमाणु है, जो परमाणु-भाव का उपभोक्ता है. उसके भी भाव को विशेष रूप से भोगने वाला महाकाल है. अणु से परमाणु और और तीन परमाणुओं का एक त्रिसरेणु होता है, जो कि सूर्य की किरणों से दिखाई देता हुए आकाश में ही रह जाता है. काल की व्याख्या करते हुए आगे लिखा गया है कि ये त्रिसरेणु तीन मिलकर जितने समय में चुटकी लगााएं (यदि इस वाक्य का सही हल मिल जाए तो मृत्यु की विस्तृत जानकारी मिल सकती है) वही समय काल है. सौ बार चुटकी लगाने में जितना समय लगे वह वेध होता है. तीन वेध अथवा निमेष के मिलने पर जितना समय हो वह लव है और तीन लव का एक क्षण (आधुनिक सेकंड) होता है, यह है हिंदूधर्म शास्त्रों की हजारों वर्षों पूर्व की गई समय की व्याख्या, तब जबकि घड़ी जैसे किसी यंत्र का विकास की कल्पना तक नहीं थी. इसमें भारतीय हिंदू धर्मग्रंथों का विशिष्ट स्थान है. विशिष्ट इसलिए कि वैज्ञानिकों ने जिन इलेक्ट्राॅन, प्रोटोन और न्यूट्रान की खोज कुछ सौ वर्ष पहले की है, उनका वर्णन इस धर्मग्रंथ में 'त्रिसरेणु' के नाम से काल की व्याख्या के अध्याय में सदियों पहले ही किया जा चुका था.
मन्वंतरों के बारे में इसमें विस्तार से बताते हुए कहा गया है कि कुल चैदह मन्वंतर होते हैं और इन चैदह मन्वंतरों में एक हजार चतुर्युग होते हैं. अभी सातवां मन्वंतर चल रहा है, इस हिसाब से यह माना जाना चाहिए कि अभी पांच सौवां कलि युग चल रहा है. वैसे यह माना जाता है कि करीब 2 अरब वर्ष इस धरती की आयु होती है. इस हिसाब से सृष्टि में मौजूद पहला सौर मंडल और उसकी धरती करीब कम से कम 14 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में थी. प्रत्येक पृथ्वी की समाप्ति का उल्लेख करते हुए यह भी बताया गया है कि संकर्षण अग्नि द्वारा इसका नाश होता है.
विज्ञान का मूल आधार परिकल्पना अथवा अवधारणा में होता है. उस परिकल्पना के मद्देनजर प्रयोग किए जाकर उस परिकल्पना की पुष्टि की जाती है और इसी आधार पर विज्ञान द्वारा होने वाली विभिन्न खोजें पूरी होती हैं. प्रकृति की प्रकृति नियमितता में है, इसे ही शाश्वत माना जाता है अर्थात् जैसा आज हो रहा है, वैसा ही कल भी होगा और वैसा ही बरसों बाद भी होगा. सूर्य और चंद्रमा इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. जैसे इनका घूर्णन निश्चत है, वैसे ही हर एक का भ्रमण तय है. इसलिए धर्मग्रंथों में वर्णित आख्यानों की व्याख्या के आधार पर यह मानना गलत नहीं होगा कि हर सौर मंडल अथवा सूर्य की धरती होती है. इसी तरह हर सौर मंडल और उसकी पृथ्वी पर इसी तरह से युगों (सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलि युग) का चलन रहा होगा. हर कलि युग में विज्ञान के प्रभाव से कल-कारखाने प्रचलन में आए होंगे, क्योंकि हर कलि युग में अभी जैसी ही तकनीकी का प्रभाव रहा होना जरूरी है.
जब वैज्ञानिक सृष्टि में अनेक सौर मंडल होने को स्वीकार करते हैं तो उन्हें यह भी स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि जो बातें हिंदू धर्म शास्त्रों में कही गई हैं, वे कपोल-कल्पित न होकर वास्तविकता के करीब हैं. यदि इन्हें आधार बनाकर वैज्ञानिक अपने शोध को आगे बढ़ाते हैं तो निश्चित रूप से कुछ नया ही हासिल कर पाने में उन्हें सफलता मिल सकेगी. इस नजरिए से देखा जाए तो जैसे आज के वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य जानने के लिए लार्ज हेड्राॅन कोलाइडर मशीन का प्रयोग कर रहे हैं, वैसे ही पहले मन्वंतर के कलि युग के वैज्ञानिकों ने उस ब्रह्मांड की उत्पति का रहस्य जानने के लिए लार्ज हेड्राॅन कोलाइडर का सहारा लिया होगा और जिसे आज के वैज्ञानिक महाविस्फोट की संज्ञा देते हैं, वह हो गया होगा, क्योंकि आज के वैज्ञानिक इस बात को तो अवश्य मान ही रहे हैं कि इस ब्रह्मांड की उत्पति का कारण महाविस्फोट होना रहा है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस महाविस्फोट के कारण तब तापमान एक खरब डिग्री हो गया था और इतने तापमान पर सब कुछ अंतरिक्षीय घोल में इसलिए बदल गया था, क्योंकि इस तापमान पर किसी भी परमाणु का अपने नाभिक के साथ रह पाना संभव नहीं हो सकता. अब पहला तो यही अहम सवाल यह पैदा होता है कि जब एक खरब डिग्री तापमान पर किसी परमाणु का नाभिक के साथ रह पाना ही संभव नहीं है तो फिर अब एक अरब तापमान से मुकाबला करने के लिए मौजूदा वैज्ञानिकों ने क्या उपाय खोजा है. और दूसरा सवाल यह कि क्या यह धरती हर बार वैज्ञानिक शोध की भेंट चढ़ जाती है?
चंूकि पहले कलि युग में भी तब के मनुष्य ने अनेक मशीनों (कल-कारखानों) के साथ विभिन्न वैज्ञानिक खोजें की होंगी, ठीक उसी तरह जैसे आज के वैज्ञानिक कर रहे हैं. उस समय भी वैज्ञानिकों ने तब ब्रह्मांड की उत्पति का रहस्य जानने के लिए किसी विधि का सहारा लिया और महाविस्फोट के कारण उस धरती का अस्तित्व ब्लैकहोल में समा गया. चंूकि उस समय के विज्ञान ने भी अपने लिए काफी खोज कर ली थी, लिहाजा वह उस महाविस्फोट के बाद समाप्त तो नहीं हुआ, लेकिन पाश्र्व में अवश्य चला गया. धीरे-धीरे वह फिर से अपने कार्यों में लीन होता गया और जो जानकारियां महाविस्फोट के कारण पाश्र्व में चली गई थीं उन पर आगे काम होने लगा. यदि इस अवधारणा को माना जाए तो इस बात की बहुत संभावनाएं बनती हैं कि गाहे-बगाहे धरती पर दिखने वाली उड़नतश्तरियां किसी अन्य सौर मंडल की धरती से आती हैं, जिसे देख पाना अभी तक हमारे वैज्ञानिकों के लिए संभव नहीं हो पाया है.
ऐसा मानने के अनेक कारण विभिन्न वजहों से हो सकते हैं, लेकिन पिफर भी मुख्य रूप से इसके लिए यदि यही बात करें कि मौजूदा समय के वैज्ञानिकों ने गति के मामले में अंतरिक्ष यान की अभी तक अधिकतम गति करीब 25 हजार मील प्रतिघंटे तक की प्राप्त कर ली है. इसी तरह अपनी खोज में क्लोन (जीव का प्रतिरूप अर्थात् एक जैसी भेड़ या अन्य कोई जानवर) बनाने की उपलब्धि हासिल कर ली है और ये सब उसने सिर्फ करीब पांच सौ साल के अंदर ही विकसित किया है. ऐसे में यदि उसे दो-चार अरब वर्ष का समय मिल जाएगा तो उसकी गति की सीमा किस हद तक पहुंच जाएगी, इसकी कोई भी कल्पना करना आसान नहीं है. इस बात की पुष्टि करने के लिए और भी बहुत सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं कि जिस तरह से आधुनिक वैज्ञानिकों ने अनेक सुविधाएं हासिल कर ली हैं, वैसे ही उपकरण पहले भी बनाए जा चुके थे. उड़नतश्तरियों के हमारी धरती पर आने के विषय में अध्ययन करते समय इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, और साथ ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति की खोज करने के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली लार्ज हेड्राॅन कोलाइडर मशीन का उपयोग करने से पहले इस तथ्य पर भी विश्लेषण किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है.

सोमवार, 9 मार्च 2009

बुरा न मानें होली है के मद्देनजर कुछ बातें धर्म-संस्कृति की

विष्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है वर्तमान भारतीय संस्कृति। ऐसा माना जाना कहीं से भी गलत नहीं होगा कि यही भारतीय संस्कृति इससे पहले आर्य संस्कृति के नाम से जानी जाती रही थी। जैसा कि विदित है संस्कृति में विभिन्न तत्व समाहित होते है, जिनसे मिलकर संस्कृति का निर्माण होता है। संस्कृति के निर्माण में प्रमुख रूप से धर्म, दर्षन, रीति-रिवाज, परंपराएं, रूढ़ियां आदि शामिल माने जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति में हिन्दू धर्म-दर्शन की प्रधानता है, इसलिए इस संस्कृति में धर्म-दर्षन, रीति-रिवाज, परंपराओं और रूढ़ियों में हिन्दू धर्म की झलक देखने को मिलती है।
हिन्दू धर्म में जहां वेद-पुराण, उपनिषद् आदि का वर्चस्व रहा है, लेकिन समय के साथ इनकी धारणाओं को अब उतना महत्व नहीं मिल पा रहा है। अध्यात्म की दृष्टि से गीता का दर्शन भी समान रूप से भारतीय जनमानस को प्रभावित करता रहा है, जबकि हिन्दू तौर तरीके से जीवन जीने के लिए रामायण को आदर्ष के समान माना जाता रहा है। चूंकि हिन्दू धर्म-संस्कृति में ऋषियों का अपना एक महत्व रहा करता था। यही वजह रही कि उनके द्वारा स्थापित किए गए मानदंडों के अनुरूप जीवन जीने से जिंदगी में सभी ऐष्वर्यों का उपभोग कर अंत में मोक्ष प्राप्त की जा सकती है।
हिन्दू धर्म का जीवन दर्षन यही है कि मनुष्य को अपने पुरुषार्थ द्वारा पृथ्वी पर उपलब्ध सभी भोगों को भोगकर अंत में मोक्ष प्राप्ति की कामना करनी चाहिए। मोक्ष प्राप्ति का तात्पर्य सृष्टिकर्ता द्वारा रचे गए जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति। देखा जाए तो पृथ्वी पर उपलब्ध सभी भोगों को भोगने के लिए मनुष्य को अनेक प्रकार के यत्न-प्रयत्न करने होते है। इन अनेक प्रकार के यत्न-प्रयत्नों को करने में कुछ धर्म के अनुरूप अर्थात जायज होते है और कुछ धर्म और नीति के विपरीत, मतलब यह कि वे नाजायज होते हैं।
यही वह स्थिति है जहां हिन्दू धर्म दर्षन में अपने अर्थात् स्वयं के अतिरिक्त विधाता अथवा नियति का उल्लेख मिलता है। इस यूं भी कह सकते हैं कि नियति की परिकल्पना की गई है। कहने का तात्पर्य यह यह है कि मान्य मापदंडों के अनुसार जीवन जीने की जो परिकल्पना हिन्दू धर्म-दर्षन में की गई है, उसमें जायज पुरुषार्थ द्वारा जो भोग उपलब्ध हो उसे ही अपी नियति मान लेना चाहिए। इसकी व्याख्या इस तरह से भी की जा सकती है कि जायज तरीके से किए गए पुरुषार्थ पर जो भोग हासिल हों, उसे विधि का विधान मान लेना ही उचित होता है। कमोबेश हिन्दू धर्म-दर्षन का मूल इसे ही माना जा सकता है।
लेकिन यदि मनुष्य द्वारा पुरुषार्थ करने में कोताही बरती जाए मतलब यह कि कोई नाजायज तरीका अपनाया जाता है तो उसे हिन्दू धर्म-दर्षन में बर्दाष्त नहीं किया जा सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दू धर्म-दर्षन में भोगों को भोगने के वषीभूत हो यदि नाजायज पुरुषार्थ किया जाना उचित नहीं माना जाता और यही वह बिंदु है, जहां हिन्दू पुराणों में उल्लेखित ‘राक्षस’ नामे प्रजाति का प्रादुर्भाव होता है, क्योंकि यदि पुरुषार्थ करने में नाजायज तरीकों का इस्तेमाल किया जाना मनुष्य को मनुष्य की श्रेणी में न रखकर राक्षस की श्रेणी में रख देता है।
सृष्टि में मनुष्य की उत्पत्ति के समय से ही दो प्रकार के मनुष्य रहे हैं, एक वे जो विधाता, ईष्वर, नियति को मानने वाले रहे अर्थात् एक प्रकार के मनुष्यों ने अपने आपको सर्वेसर्वा मानने के बजाए अपने अतिरिक्त किसी शक्ति के अस्तित्व को माना, जो इस सृष्टि का संचालन करती रही है और करती है। इस तरह के मनुष्यों ने पूर्वजों अथवा बुजुर्गों द्वारा निर्धारित किए गए जीवन जीने के सिद्धांतों, मानदंडों के अनुसार (हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार) अपने जीवन को जिया। इसी तरह दूसरे प्रकार के मनुष्य वे रहे जो अपने आपको सर्वेसर्वा मानते हुए पुरुषार्थ करते थे अर्थात् प्ृथ्वी पर उपलब्ध भोगों को करने में जिन्होंने जायज, नाजायज का ध्यान न रखते हुए अपने बाहुबल पर विष्वास किया और पर उपलब्ध भोगों का उपभोग किया। साथ ही जो स्वयं ही हर परिस्थिति में अपी रक्षा करने में सक्षम रहे। इसे यों भी कह सकते हैं कि इन्होंने सृष्टि के संचालन में किसी भी दृष्य या अदृष्य शक्ति के अस्तित्व को नहीं मानकर अपने भोगों के लिए पुरुषार्थ किया।
हिन्दू धर्म-दर्षन में इस तरह के लोगों को मनुष्य की संज्ञा दी गई जबकि दूसरे तरह के लोग (जो किसी भी दृष्य या अदृष्य शक्ति के अस्तित्व को नहीं मानने वाले रहे) राक्षस की श्रेणी में रखे गए। हिन्दू पुराणों में उल्लेखित राक्षस शब्द का व्याकरण के अनुसार अर्थ होता है अपनी रक्षा करन वाला। रावण को सर्वकालिक और सबसे बड़े राक्षस की संज्ञा दी गई है। वैसे भी हिन्दू धर्मशास्त्र राक्षसों के उत्पीड़न से भरे पड़े हैं। इनके व्यवधान की गाथा के बिना किसी भी पुराण का कोई भी अध्याय पूरा नहीं हो पाया है, ठीक उसी तरह जिस तरह वर्तमान में आतंकवाद और आतंकवादियों की हरकतों की जिक्र के बिना किसी भी समाचार पत्र अथवा पत्रिका पूरी नहीं हो पाती है।
इसे हिन्दू धर्म की विडम्बना ही कहा जाएगाा कि पुराणों आदि में उल्लेखित इन विभिन्न घटनाक्रमों का व्यावहारिक तौर पर मूल्यांकन नहीं किया गया। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसा पुरखों ने बता दिया उसी पर आंख बंद कर अमल करते जाने में सभी ने अपनी भलाई समझी। शायद इसी का नतीजा है कि पूरी दुनिया को आतंकवाद से जूझना पड़ रहा है। वैसे इस बात को नहीं माना जा रहा है कि हिन्दू धर्मषास्त्रों में लिखी गई बातें कपोल कल्पित है। यहां इस बात का उल्लेख इसलिए किया गया है कि हिन्दू धर्मधर्मषास्त्रों में लिखी गई बातों का समय बदलने के साथ-साथ मूल्यांकन नहीं किए जाने की वजह से ही आज पूरी दुनिया आतंकवाद और आतंकवादियों की हरकतों से रूबरू है। यदि इनका समय रहते व्यावहारिक मूल्यांकन कर लिया जाता तो कम से कम इन आतंकी गतिविधियों से देष-दुनिया को सामना नहीं करना पड़ता।
अगले ब्लाॅग के लिए प्रतीक्षा करें।

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रविवार, 18 जनवरी 2009

हिंग्लिष की बदौलत शिखर पर!

हिंग्लिष की बदौलत शिखर पर!
कुलदीप कालक्षेपी
पिछले कुछ वर्षाें में राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रिंट मीडिया में समाचार-पत्र, पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या को रोकने के उपाय खोजे गए. सूचना क्रांति और इंटरनेट के दौर में पाठकों की कमी के चलते अमेरिका और यूरोप में अखबारों की हुई दुर्गति से निपटने के लिए जो उपाय किए गए, उनमें अखबार का आकार परिवर्तन प्रमुख रहा. मतलब यह कि पश्चिमी देशों में जिन बड़ी साइज के अखबारों का प्रसार कम हो रहा था और जिन्हें नई पीढ़ी के पाठक ढूंढे नहीं मिल रहे थे, उन्होंने अपने अखबार की साइज में परिवर्तन कर छोटे आकार में 'काॅम्पेक्ट' पेपर निकालना शुरू किया. इससे न केवल उनका गिरता प्रसार थम गया, बल्कि इसका फायदा यह मिलने लगा कि नई पीढ़ी जो अखबार से परहेज करती थी, उसने भी इसे पढ़ने में रुचि दिखनी शुरू कर दी.
यदि भारतीय संदर्भ मं बात करें तो पिछले दो दषकों में इसके लिए हर जागरूक अखबार ने अपनी ओर से भरसक प्रयास किए हैं. इसमें पिं्रट के साथ 'विजुअल' (सचित्र) समाचार का बड़े पैमाने पर समावेष किए जाने के साथ आकार और रूप-रंग में परिवर्तन किया जाना प्रमुख रहे हैं. इतना ही नहीं कमाबेष सभी बड़े समाचार पत्रों द्वारा मौके-बेमौके विषेष परिषिष्टों का प्रकाषन अपने पाठकों को परोसा गया. इन सब परिवर्तनों की बदौलत हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या में पिछले कुछ वर्षों में एकाएक तेजी आ गई. इसमें भी गौर करने लायक बात यह है कि अर्से तक क्षेत्रीय अखबार की छवि से जूझ रहे कुछ समाचार पत्रों ने न केवल अपने को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया, बल्कि अपनी प्रसार संख्या के बलबूते पर वर्षों से चले आ रहे अंग्रेजी समाचार पत्रों के दबदबे को भी हाषिए पर धकेल कर प्रसार के नए कीर्तिमान स्थापित कर डाले.
उनकी इस प्रगति से प्रिंट मीडिया जगत की जानी-मानी हस्तियां तक भौंचक रह र्गइं. विषय-विषेषज्ञों ने जहां इनकी बढ़ती प्रसार संख्या के लिए अपने-अपने तर्क दिए, वहीं आम आदमी ने कुछ समाचार पत्रोें के बढ़ते प्रसार का कारण इनके द्वारा चलाए जाने वाली आकर्षक इनामी योजनाओं को दिया है, वहीं कुछ बढ़ते संस्करणों को इसकी वजह बताते हैं. लेकिन हाल-फिलहाल तक कोई भी इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि कुछ ही वर्षों में इन्होंने अपनी भाषाई समाचार पत्र की छवि को तोड़ते हुए राष्ट्रीय समाचार पत्रों का दर्जा प्राप्त कर लिया.
इस पूरे मामले में दिलचस्प तथ्य यह भी है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए. यह सारी उठापटक सिर्फ उत्तर भारतीय इलाके अर्थात् हिन्दीभाषी क्षेत्र में ही ज्यादा दिखाई दी है, शेष भारत की हालत में कुछ खास अंतर नहीं आया. अखबारों की प्रसार संख्या में कमी-बढ़ोत्री की तमाम जद्दोजहद के बावजूद किसी भी विषय-विशेषज्ञ ने इस बात की ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया कि मौजूदा पीढ़ी की भाषा और उसके तौर-तरीके क्या हैं. यदि इस ओर थोड़ा भी गौर किया जाता तो सारी असलियत तुरंत ही सामने आ जाती.
दरअसल इस समय उत्तर भारतीय शहरी आबादी में युवाओं की मातृभाषा भले ही हिन्दी कही जाती हो, लेकिन असल में उनकी मातृभाषा हिन्दी अथवा कोई और भाषा न होकर हिंग्लिश हो गई है, क्योंकि इस इलाके के अधिकांश हिन्दीभाषी युवाओं की पढ़ाई-लिखाई कथित इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में हो रही है. ये युवा अंग्रेजी के शब्दों का अर्थ हिन्दी के साधारण शब्दों की बजाए अधिक अच्छी तरह से समझ पाते हैं. कहने का मतलब यह है कि हिन्दी के किसी शब्द-विशेष का अर्थ उन्हीं मालूम हो या नहीं, पर अंग्रेजी के शब्द का 'मीनिंग' उन्हें अच्छी तरह से याद होता है. और यही वह तथ्य है, जिसने इस समय शीर्ष पर कुछ हिन्दी समाचार पत्रों को पहुंचाया है, क्योंकि इन समाचार पत्रों के मुख्य समाचारों में हिंग्लिष का प्रयोग हुआ होता है.
यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि हिन्दीभाषी बच्चा कथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अपने अभिभावकों की बदौलत दाखिला तो ले लेता है, लेकिन घर-बाहर उसे भाषा और लिपि दोनों में ही हिन्दी की बहुलता मिलती है. इतना ही नहीं, घर पर जो अखबार आता है, वह हिन्दी का होता है. इसमें कई-कई शब्द ऐसे भी होते हैं, जिनका उसे तो क्या उसके परिवारजनों को भी ठीक-ठीक अर्थ मालूम नहीं होता, भले ही मातृभाषा हिन्दी है. यदि इसका कारण खोजा जाए तो यह अपने आप ही स्पष्ट हो जाता है कि बोलचाल में ऐसे कई अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल शुरू हो चुका है, जो अब हिन्दी के शब्द ही लगते हैं. इसका एक सीधा सा उदाहरण यही है कि यदि आप किसी से 'समय' जानना चाहते हैं तो यही पूछेंगे कि 'टाइम' क्या हुआ है. 'समय' की जगह 'टाइम' ने काफी पहले ही ले ली थी. अब तो हालत यह है कि 'आपकी प्रतीक्षा है' का स्थान 'वेटिंग फाॅर यू' और 'अच्छा स्वास्थ्य हृदय को तंदुरुस्त बनता है' का स्थान 'गुड हेल्थ मेक्स ए हेल्दी हार्ट' ने ले लिया है.
ऐसे में कथित अंग्रेजी माध्यम में पढ़ा आज का युवा जब बतौर लिपि इन शब्दों हिन्दी में पढ़ता है तो उसे इसे पढ़ने में झुंझलाहट नहीं होती है और न ही उसे इसमें अपना दिमाग लगाने की जरूरत महसूस होती है, क्योंकि लिपि के तौर पर हिन्दी पढ़ना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान होता है. अब यदि किसी अखबार में इस तरह की हिंग्लिष का उपयोग किया जाएगा तो निष्चित तौर पर उसे पसंद किया जाना स्वाभाविक ही माना जाएगा. इसे देखते हुए ही कुछ अखबारों ने सहज संपे्रषण के लिए परंपरागत शुद्ध हिन्दी के स्थान पर हिंग्लिष को प्रमुखता देना अपनी नीतियों में ही शामिल कर लिया है. वास्तविकता के घरातल पर देखने अर्थात् अखबारों के मौजूदा प्रसार पर नजर डालने पर यह बात आसानी से गले भी उतरती है.

शनिवार, 3 जनवरी 2009

मैं अपना पहला संदेश श्री हरिराम जी के लिए छोड़ रहा हूँ। मुझे ये जानकारी चाहिए कि श्रीलिपि में टाइप किया हुआ metter krutidev font में करने के लिए मुझे क्या करना होगा।

मुझे आशा है कि आप इसका जानकारी से avgat karayenge।
dhanyawad।
kuldeep