रविवार, 18 जनवरी 2009

हिंग्लिष की बदौलत शिखर पर!

हिंग्लिष की बदौलत शिखर पर!
कुलदीप कालक्षेपी
पिछले कुछ वर्षाें में राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रिंट मीडिया में समाचार-पत्र, पत्रिकाओं की घटती प्रसार संख्या को रोकने के उपाय खोजे गए. सूचना क्रांति और इंटरनेट के दौर में पाठकों की कमी के चलते अमेरिका और यूरोप में अखबारों की हुई दुर्गति से निपटने के लिए जो उपाय किए गए, उनमें अखबार का आकार परिवर्तन प्रमुख रहा. मतलब यह कि पश्चिमी देशों में जिन बड़ी साइज के अखबारों का प्रसार कम हो रहा था और जिन्हें नई पीढ़ी के पाठक ढूंढे नहीं मिल रहे थे, उन्होंने अपने अखबार की साइज में परिवर्तन कर छोटे आकार में 'काॅम्पेक्ट' पेपर निकालना शुरू किया. इससे न केवल उनका गिरता प्रसार थम गया, बल्कि इसका फायदा यह मिलने लगा कि नई पीढ़ी जो अखबार से परहेज करती थी, उसने भी इसे पढ़ने में रुचि दिखनी शुरू कर दी.
यदि भारतीय संदर्भ मं बात करें तो पिछले दो दषकों में इसके लिए हर जागरूक अखबार ने अपनी ओर से भरसक प्रयास किए हैं. इसमें पिं्रट के साथ 'विजुअल' (सचित्र) समाचार का बड़े पैमाने पर समावेष किए जाने के साथ आकार और रूप-रंग में परिवर्तन किया जाना प्रमुख रहे हैं. इतना ही नहीं कमाबेष सभी बड़े समाचार पत्रों द्वारा मौके-बेमौके विषेष परिषिष्टों का प्रकाषन अपने पाठकों को परोसा गया. इन सब परिवर्तनों की बदौलत हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या में पिछले कुछ वर्षों में एकाएक तेजी आ गई. इसमें भी गौर करने लायक बात यह है कि अर्से तक क्षेत्रीय अखबार की छवि से जूझ रहे कुछ समाचार पत्रों ने न केवल अपने को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया, बल्कि अपनी प्रसार संख्या के बलबूते पर वर्षों से चले आ रहे अंग्रेजी समाचार पत्रों के दबदबे को भी हाषिए पर धकेल कर प्रसार के नए कीर्तिमान स्थापित कर डाले.
उनकी इस प्रगति से प्रिंट मीडिया जगत की जानी-मानी हस्तियां तक भौंचक रह र्गइं. विषय-विषेषज्ञों ने जहां इनकी बढ़ती प्रसार संख्या के लिए अपने-अपने तर्क दिए, वहीं आम आदमी ने कुछ समाचार पत्रोें के बढ़ते प्रसार का कारण इनके द्वारा चलाए जाने वाली आकर्षक इनामी योजनाओं को दिया है, वहीं कुछ बढ़ते संस्करणों को इसकी वजह बताते हैं. लेकिन हाल-फिलहाल तक कोई भी इस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि कुछ ही वर्षों में इन्होंने अपनी भाषाई समाचार पत्र की छवि को तोड़ते हुए राष्ट्रीय समाचार पत्रों का दर्जा प्राप्त कर लिया.
इस पूरे मामले में दिलचस्प तथ्य यह भी है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए. यह सारी उठापटक सिर्फ उत्तर भारतीय इलाके अर्थात् हिन्दीभाषी क्षेत्र में ही ज्यादा दिखाई दी है, शेष भारत की हालत में कुछ खास अंतर नहीं आया. अखबारों की प्रसार संख्या में कमी-बढ़ोत्री की तमाम जद्दोजहद के बावजूद किसी भी विषय-विशेषज्ञ ने इस बात की ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया कि मौजूदा पीढ़ी की भाषा और उसके तौर-तरीके क्या हैं. यदि इस ओर थोड़ा भी गौर किया जाता तो सारी असलियत तुरंत ही सामने आ जाती.
दरअसल इस समय उत्तर भारतीय शहरी आबादी में युवाओं की मातृभाषा भले ही हिन्दी कही जाती हो, लेकिन असल में उनकी मातृभाषा हिन्दी अथवा कोई और भाषा न होकर हिंग्लिश हो गई है, क्योंकि इस इलाके के अधिकांश हिन्दीभाषी युवाओं की पढ़ाई-लिखाई कथित इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में हो रही है. ये युवा अंग्रेजी के शब्दों का अर्थ हिन्दी के साधारण शब्दों की बजाए अधिक अच्छी तरह से समझ पाते हैं. कहने का मतलब यह है कि हिन्दी के किसी शब्द-विशेष का अर्थ उन्हीं मालूम हो या नहीं, पर अंग्रेजी के शब्द का 'मीनिंग' उन्हें अच्छी तरह से याद होता है. और यही वह तथ्य है, जिसने इस समय शीर्ष पर कुछ हिन्दी समाचार पत्रों को पहुंचाया है, क्योंकि इन समाचार पत्रों के मुख्य समाचारों में हिंग्लिष का प्रयोग हुआ होता है.
यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि हिन्दीभाषी बच्चा कथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अपने अभिभावकों की बदौलत दाखिला तो ले लेता है, लेकिन घर-बाहर उसे भाषा और लिपि दोनों में ही हिन्दी की बहुलता मिलती है. इतना ही नहीं, घर पर जो अखबार आता है, वह हिन्दी का होता है. इसमें कई-कई शब्द ऐसे भी होते हैं, जिनका उसे तो क्या उसके परिवारजनों को भी ठीक-ठीक अर्थ मालूम नहीं होता, भले ही मातृभाषा हिन्दी है. यदि इसका कारण खोजा जाए तो यह अपने आप ही स्पष्ट हो जाता है कि बोलचाल में ऐसे कई अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल शुरू हो चुका है, जो अब हिन्दी के शब्द ही लगते हैं. इसका एक सीधा सा उदाहरण यही है कि यदि आप किसी से 'समय' जानना चाहते हैं तो यही पूछेंगे कि 'टाइम' क्या हुआ है. 'समय' की जगह 'टाइम' ने काफी पहले ही ले ली थी. अब तो हालत यह है कि 'आपकी प्रतीक्षा है' का स्थान 'वेटिंग फाॅर यू' और 'अच्छा स्वास्थ्य हृदय को तंदुरुस्त बनता है' का स्थान 'गुड हेल्थ मेक्स ए हेल्दी हार्ट' ने ले लिया है.
ऐसे में कथित अंग्रेजी माध्यम में पढ़ा आज का युवा जब बतौर लिपि इन शब्दों हिन्दी में पढ़ता है तो उसे इसे पढ़ने में झुंझलाहट नहीं होती है और न ही उसे इसमें अपना दिमाग लगाने की जरूरत महसूस होती है, क्योंकि लिपि के तौर पर हिन्दी पढ़ना उसके लिए अपेक्षाकृत आसान होता है. अब यदि किसी अखबार में इस तरह की हिंग्लिष का उपयोग किया जाएगा तो निष्चित तौर पर उसे पसंद किया जाना स्वाभाविक ही माना जाएगा. इसे देखते हुए ही कुछ अखबारों ने सहज संपे्रषण के लिए परंपरागत शुद्ध हिन्दी के स्थान पर हिंग्लिष को प्रमुखता देना अपनी नीतियों में ही शामिल कर लिया है. वास्तविकता के घरातल पर देखने अर्थात् अखबारों के मौजूदा प्रसार पर नजर डालने पर यह बात आसानी से गले भी उतरती है.

4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा विश्लेषण
    आगे भी जारी रखियेगा

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  2. बहुत अच्छा! सुंदर लेखन के साथ चिट्ठों की दुनिया में स्वागत है। चिट्ठाजगत से जुडऩे के बाद मैंने खुद को हमेशा खुद को जिज्ञासु पाया। चिट्ठा के उन दोस्तों से मिलने की तलब, जो अपने लेखन से रू-ब-रू होने का मौका दे रहे है का एहसास हुआ। आप भी इस विशाल सागर शब्दों के खूब गोते लगाएं। मिलते रहेंगे। शुभकामनाएं।

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  3. अच्छी जानकारी दी आपने !

    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर !

    अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा !

    मेरी शुभकामनाएं

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  4. स्वागत है आपका ब्लॉग जगत में लिखते रहें निरंतर

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